ना गुल न ये गुलिश्तां हमारा है,
जिसे पूजते हैं, न वो फरिस्ता हमारा है,
चल पड़े हैं जिस मंजिल कि और,
ना वो मंजिल ना वो रास्ता हमारा है...

दीपक खरबाट