मेरे लिए तेरी नज़रों की रौशनी है बुहत
के देख लूँ तुझे पल भर,मुझे यही है बुहत
ये और बात के चाहत के ज़ख्म गहरे हैं
तुझे भुलाने की कोशिश तो वरना की है बुहत
कुछ इस खता की सज़ा भी तो कम नही मिलती
ग़रीब-ए-शहर को इक जुर्म-एआगाही है बुहत
कहाँ से लाऊँ वो चेहरा, वो गुफ्तुगू, वो अदा
हज़ार हुस्न है गलियों में,आदमी है बुहत
कभी तो मुहलत-ए-नज़ारा, निक'हत गुजरां
लबों पे आग सुलगती है, तिशनगी है बुहत
किसी ने हँस के जो देखा तो हो गए उस के
के इस ज़माने में इतनी सी बात भी है बुहत
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Jeene ki EK Nayi Adaa Di Hai, Khush Rehne Ki Usne Dua Di Hai,
Ae Khuda Use Sara Jahaan Dena, Jisne Apne Dil Me Hame Thodi Si Jagah Di Hai!