तेरे अंदर ज़माने भर की . एक कशिश सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

हर बार ये दिल तेरे आगे एक हूक सी भरे ,
कुछ ना कह कर भी सब कुछ तुझे समर्पित करे ,
तेरे अंदर सवालों की . एक नमी सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

तूने ये इश्क़ सिखाया मुझे तो क्या बुरा किया ,
पर इस इश्क़ को निभाने की सूरत क्यूँ इतनी बुरी है ?
तेरे अंदर खुमारी की . एक चमक सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

हर बार इस दिल को तेरे साथ हम भी सम्भाला करते हैं ,
और अपने दिल में हज़ारों राज़ के घरों को दफनाया करते हैं ,
तेरे अंदर समाने की . एक ललक सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

तूने बना कर एक किताब हमें बोलो भला पढ़ा क्यूँ ?
हम बनके उस किताब के पन्ने भला जले क्यूँ?
तेरे अंदर हर हर्फ़ को समझने की . एक तलब सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

मैं तेरे साथ ना जाने कितनी बार अपने आँसुओं को गिना करती हूँ ,
ये कैसी मज़बूरी है बता जिसके साथ जिया करती हूँ ,
तेरे अंदर मुझे हँसाने की . एक दमक सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

तुमने जब भी मुझे कहा कि बताऊँ मैं तुझे अपने दिल का फ़साना ,
मैं हर शब्द को लपेट कर बनाती रही रोज़ एक बहाना ,
तेरे अंदर हर बहाने को परखने की . एक वजह सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

मैं तेरे इश्क़ की खादिम बन बैठी देख किसी रोज़ यूँही ,
तूने फिर भी न समेटा बढ़कर मेरे अरमानो को निर्मोही ,
तेरे अंदर मेरे अधूरेपन की . एक दवा सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।

तेरे अंदर ज़माने भर की . एक कशिश सी क्यूँ है ?
ना जाने क्या है तेरे अंदर . जो लगता मुझे हसीं है ।