कुछ ख़ाली पन्ने, ज़िन्दगी की किताब में हैं अभी,
शायद दाग हैं, जो याद बन गए थे कभी,

कोइ जिन्हे पढ़ न सके,
कुछ गुज़रे ज़माने के अनकहे अफ़साने हैं,

घुले नहीं है़ं वो अल्फ़ाज़ ,वक़्त में कहीं,
मेरे ज़हन में रहते हैं,
मेरे साथ ही जाने हैं।


ंंंंंंंंंं समीर!,,,, , ,,,,