सवार लूँ ज़िन्दगी अपनी,
एसा सोचता हूँ कभी,

फिर लम्हा लम्हा मोम सी ,
पिघलते देखता हूँ तुझे , ऐ ज़िन्दगी ,

बेवफ़ा तो नहीं मगर,
मजबूर है ज़िन्दगी ,

अन्धेरों को रोशनी में बदल जाएगी ,
ये लौ एक दिन,
किसी के काम तो आएगी ज़िन्दगी ,

जाने के बाद सब भूल जाएँगे,
जो हमें भुला न पाएँ,
शायद उसी का नाम है इबादत ,
ईसी का नाम है बन्दगी ।


ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं Sam ९/०४/२०१४