मैं चाहता कुछ हूँ
होता कुछ और है।
मैं जाता कहीं हूँ
पहुँचता कहीं और हूँ।
मेरे प्रेरणास्रोत हैं
भगवान श्रीराम।
पर क्यों मैं चल पड़ता हूँ
रावण के पदचिह्न पर।
स्त्री स्त्री में
क्यों मैं भेद करता हूँ
घर पर माँ बहनें हैं।
बाहर में सभी से
रंभा सा क्यों बरतता हूँँ।

बहुत दुख होता है
अपनी इस चरित्र पर।
चले हैं रावण दहन करने
अपने अंदर में
एक रावण रख।
अपने अंदर के अंधियारे को
पहले दूर हटाओ।
रावण तुम्हारे अंदर है
पहले उसे मार भगाओ।

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